अपनों का पराया हो जाना
बहुत पीड़ादायक है अपनों का पराया हो जाना बस हम देखते रहते है उन्हें जाते हुये बीते लम्हें कौंधते है कि एक दिन ऐसे भी थे हम साथ थे पास थे .. सच है कीमत चुकानी पड़ती है पर कभी-कभी दोनों नही हाथ आते जिसके लिए कीमत चुकायी न वो और जिसकी कीमत चुकायी वो तो क्या ही हाथ आयेगा... और चुक जाता है इंसान शांत हो जाता है क्योकि शोर सुनने वाले बिछड़ गये होते है